रविवार, 25 अक्टूबर 2009

माँ थी वो

एक प्यारी सी माँ ही थी ,अपने दोनों लाडले के साथ २ दोनों बेटियों के लिए जान देती थी हमेशा ,मैंने देखा है उसको पागल होते हुए जब उसके बेटे की तबियत मामूली सी बिगड़ गयी थी .
        कल की ही बात है ,चारो तरफ छठ महा पर्व की तयारी चल रही थी ,उसके छोटी बहु ( पतोहू ) ने सिल्क की साडी पहनाई ,खूब सजाया अपने हाथो से ,क्यूंकि याद था कभी रंग-बिरंगे खुबसूरत कपडे उसी माँ ने थैले भर २ के लाकर दिए थे सबको ,
सज - सवर कर छठ के घाट पर माँ-बहु एक साथ गए ,सब कुछ खुशियों से भरपूर था !घाट पर बहुत सी औरतों को देख कर माँ कभी उदास जैसी हो जाती थी ( शायद  उसे कुछ अतीत याद आ रही हो )२ वर्ष भी नहीं हुए उनके पति को गुजरे हुए ,वे एक सरकारी सर्विस में थे ,हमेशा छठ में वे अपने माथे पर पूजा सामग्री का टोकरी उठा कर ले जाया करते थे .
         कुछ ही समय में वो सामान्य होने लगी,अब वो हसने मुस्कुराने लगी ,बहुत दिल से छठ माँ की पूजा की , तभी किसी ने घर की बात चला दी ,दादी माँ क्या बात है जो आप अपने गाँव  में पूजा न कर छोटे बेटे के पास चली आई ? ( जैसे छोटे बेटे के पास पूजा करने आना कोई अपराध हो ) वो सबका मुंह देखने लगी ,शायद  कुछ बताने में शर्म आ रही थी , तभी एक रिश्तेदार जो उसी समय उनके गाँव से वापस आया था न जाने क्या सूझी सबके सामने बोल दिया --- कल ही तो इनके बड़े बेटे ने घर सी निकल जाने की बात बोली थी इन्हें ,बाकि बातें जैसे माँ को खुद याद आ गयी ---- जाओ तुम्हारे पेंशन की राशिः से मुझे कोई मतलब नहीं ,लेकिन जाओ छोटे बेटे के पास ,यहाँ रह कर पूजा में विघ्न न बनो ,यहाँ तुम्हे कौन देखेगा ऐसे भी एक-दो दिन छोटा भी तो बोझ उठाये तुम्हारा .! अब तो बोझ ही थी वो उसका अपना घर था कहाँ ?जो मकान उसने बनवाए हम सभी से सलाह लेती थी की और कुछ क्या किया जाये की इससे ज्यादा खुबसूरत बन सके ,अब वो बड़े बेटे का हुआ न ,( मकान तो सच में खुबसूरत बन गया लेकिन अफशोस घर को वो सुंदर ना बना सकी )पति के बाद मिलने वाले पेंशन भी बड़े बेटे को ही तो देती थी क्यूंकि उसके ज्यादे बच्चे है खर्च भी छोटे से ज्यादा है .! छोटा तो सरकारी सर्विस में है अपने परिवार के साथ सरकारी क्वार्टर में रहता है ,आखिर छोटे के पास वो किस लाज से आवे ?कभी पेंशन की राशिः उसे जो नहीं दी थी ! तब भी बड़े ने पहुंचा दिया था उसे !
         वो ये सब बातें छोटी बहु से भी नहीं बताई थी ,इस नस्कुटे ने ये सब क्या कर दिया यहाँ ?
छठ माँ के उपर माथा टेकने के बाद खुद का माथा दोनों हाथो से पकड़ लिया और  धीरे से आवाज़ निकली ,हे छठ मैयां अब न सह पाऊँगी इतना अपमान ,अब जाने का रास्ता दो ,एक हलकी चीख के साथ बेहोश हो गयी ! एक डॉ. ने जवाब दिया फिर हॉस्पिटल का भी खर्च बचा दी उसने ,रास्ते में ही  चल दी अपनी राह .हे राम ......
  अब तो न माँ रही , न पेंशन का लफडा जाते २ भी किसी को अपना भार उठाने का मौका नहीं दी उसने !
अब दोनों लाडले लड़ते रहें ,बीच में वो थोड़े बोलेंगी की मेरे लिए दोनों आँख के तारें हो ,मेरे बाद ही लड़ना ,तब भी तो रोज ही दोनों एक दुसरे पर तलवार खींचते रहते है ,! अब शायद खींचे ही नहीं ..........

2 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण जी,
    बहुत ही मर्मस्पर्शी और भावुक कर देने वाली कहानी है आपकी---सचमुच आज सारे रिश्ते,नाते,मानवीय सवेदनायें सभी कुछ समाप्त होता जा रहा है इस भौतिकतावाद की दौड़ के आगे।
    पूनम

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  2. आपने इसे पढ़ा, मुझे ख़ुशी हुयी ,जानकारी के लिए बताना चाहूँगा की ये सत्य घटना है.

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