गुरुवार, 23 मई 2013

बिहार की शिक्षा प्रणाली -बदहाली ,( शिक्षक या लेबर )

                आज  बहुत दिनों के बाद बदलते हुए बढ़ते हुए बिहार के शिक्षण व्यवस्था पर कुछ लिखने का विचार आया . यहाँ पर विगत कुछ बरसों से शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो रही बल्कि उनका नियोजन हो रहा है .
नीतीश जी के पूर्व तो वो भी नहीं हो रहा था , इसलिए सभी शिक्षक एवं उनके परिवार वालों के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, बहुत दिनों के बाद घर के किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी जो मिल गयी ......  मुझे इस नियोजन शब्द का कुछ खास मतलब पहले समझ में नहीं आया , अब जाकर समझा हूँ कि जिस नौकरी से अपना और परिवार का भरण - पोषण हो उसे नियुक्ति कहते है और जिससे अपना भी पेट नहीं भरे उसे नियोजन कहते है , 
                आज-कल किसी भी चौराहे पर जायें  किसी भी मजदूर या हेल्पर को कम से कम ३ या ज्यादा भी देना पड़ेगा तो वो अधिक से अधिक आपके यहाँ ५ से ६ घंटा ड्यूटी (काम) मुश्किल से कर सकेगा . लेकिन मजाल है जो कोई नियोजन वाला शिक्षक अपनी बराबरी किसी मजदूर से कर सके. अगर सहस जुटाया तो गए काम से , बिच चौराहे पर पुलिस की डंडो  की मार पड़ेगी . किसे नहीं याद होगा शिक्षक और शिक्षिकाओं को खदेड़ - खदेड़ कर पिटाई करना . हो भी क्यों नहीं सुशासन की सर्कार में अपनी बात भी कहने का एक ढंग होना चाहिए , आप चुपचाप भूखे मारिये , सरकार खुद ही समझ जाएगी की ये मरकर भी अपनी बात सादगी से कह गया .   
     बेचारे नियोजित शिक्षक सायकिल से विद्यालय पढ़ाने  जायें तो देर हो जाये , कभी-कभी इज्जत पे बन आती है क्योंकि कोई ना कोई विद्यार्थी जो मोटरसायकिल पे होता है बगल से फर्राटा भरता हुआ निकल जाता है, उस क्षण मास्टर जी पर क्या गुजरती है वो ही जानते है।
          मोटरसायकिल से विद्यालय जाना तो अब मज़बूरी बन गयी , लेकिन कलमुही पेट्रोल है जो सुरसा जैसे सरे पैसे निगल जाती है, उसपर लंच टाइम का लफड़ा है सो अलग , घर से जो बन पड़ा लेकर तो गए , लेकिन बुरा हो उसमे पहले से नियुक्त पुराने शिक्षकों का जो जान-बुझकर सिर्फ जलाने के ख्याल से रोड के दूकान से कुछ ना कुछ अलग से वेरायटी माँगा लेते है अपने लिए , कम से कम बराबरी करने के लिए ही सही कुछ तो मांगना अब नियोजित शिक्षक के लिए भी तो जरुरी हो गया , जेब हलकी यहाँ भी हो गयी, रही -सही कसार घर से आया बीवी का फ़ोन ने कर दिया , फरमान हुआ बच्चे के लिए कुछ लेते आये और साथ में वहां के बाज़ार में ताज़ी शब्ज़ियाँ मिलती है, याद कर जरुर लेते आना . उफ़ घट  गए महीने के बेतन .... कहाँ से लाये, क्या करें ... इससे तो अच्छा था घर पर ही रहते , उधर नौकरी के चलते खेती भी चौपट हो गयी , खुद के बदले लेबर लगाया खेती में तो उसके लिए भी बेतन नहीं ....
    सरकार है कि उसकी जमा धनराशि ख़त्म नहीं हो रही, अच्छे भले विद्यालय को तोड़कर न्यू मॉडल बना रही है, फर्श से लेकर अर्श तक सब रेमोडलिंग , टाइल्स लगाने से भी राशि खर्च नहीं हो पा  रहा , मार्च में पैसे वापस ही हो जा रहे है , किन्तु स्थायी नियुक्ति करने  की गलती सरकार नहीं कर सकती .
    गुजरात के लिए तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा की ये शिक्षा के सहयोगी है की शिक्षा के दुश्मन , जब इनका ही पेट नहीं भरेगा तो बच्चो को क्या शिक्षा देंगे ? लेकिन बिहार के लिए क्या ख्याल है ...........